महेंद्र मिश्र : ऊ क्रांतिकारी-गायक जेकरा खातिर तवायफ सब आपन गहना उतार देहल

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भोजपुरी साहित्य में गायकी के जब-जब चर्चा होला महेंद्र मिश्र के पूरबी सामने खड़ा हो जाला. मानल जाला कि महेंद्र मिश्र जइसन केहू दूजा न, भईल न होई. महेंद्र मिश्र के जन्म छपरा के मिश्रवलिया में आजे के दिन 16 मार्च 1886 के भईल. माटी के लाल महेंद्र मिश्र के बारे में मैथिली भोजपुरी अकदमी के गवर्निंग बॉडी मेम्बर अउरी दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर मुन्ना पाण्डेय जी से गहना टीम के बातचीत के संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत बा.

घर, परिवार अउरी गायक के उभार

महेंद्र मिश्र बचपने से पहलवानी, घुड़सवारी, गीत, संगीत में तेज रहनीं. पुरबी सम्राट महेंदर मिसिरजी के बिआह रुपरेखा देवी से भईल रहे जिनका से हिकायत मिसिर के नाव से एगो लईका भी भईल, बाकी घर गृहस्थी मे मन ना लागला के कारन महेन्दर मिसिर जी हर तरह से गीत संगीत कीर्तन गवनई मे जुटि गईनी. बाबुजी के स्वर्ग सिधरला के बाद जमीदार हलिवंत सहाय जी से जब ढेर नजदीकी भईल त उहा खातिर मुजफ्फरपुर के एगो गावे वाली के बेटी ढेलाबाई के अपहरण कई के सहाय जी के लगे चहुंपा देहनी. बाद मे एह बात के बहुत दुख पहुंचल आ पश्चाताप भी कईनी संगे संगे सहाय जी के गइला के बाद, ढेला बाई के हक दियावे खातिर महेन्दर मिसिर जी कवनो कसर बाकी ना रखनी!

महेंद्र मिसिर के विरासत में संस्कृत के ज्ञान अउरी आसपास के समाज में अभाव के जीवन मिलल जेमे ऊ अंत समय तक भाव भरत रह गइनीं. एही से उहाँ के रचना में देशानुराग से लेके भक्ति, श्रृंगार अउरी वियोग के बहुत दृश्य मिलेला.

शोहरत के आलम ई कि भारत ही ना बल्कि दुनिया के जवन जवन हिस्सा (फिजी, मारिशस, सूरीनाम, नीदरलैंड, त्रिनिदाद, ब्रिटिश गुयाना) में गिरमिटिया लोग गईल, महेंद्र मिश्र के गायकी उनके सफ़र अउरी आपन माटी के पाथेय बनके साथे गईल. साहित्य संगीत के इतिहास में विरला ही केहू होई जे एक साथ शास्त्रीय अउरी लोक संगीत पर गायन-वादन में दक्षता राखत होखे, अपना आसपास के राजनीतिक सामाजिक हलचल में सक्रिय भागीदारी राखत होखे अउरी पहलवानी के शौक भी रखता होखे. महेंद्र मिश्र के जीवन में रूमानियत के साथे भक्ति के भी साहचर्य रहल. एह कवि के मित्रभाव अइसन रहल कि अपना जमींदार मित्र हलिवंत सहाय के प्रेम खातिर मुजफ्फरपुर से ढेलाबाई के अपहरण करके मित्र के लगे पहुंचा देह्नीं.

हालांकि आपन एह काम के पश्चाताप स्वरुप महेंदर मिसिर ढेलाबाई के साथ अंत तक निभवनी. हलिवंत सहाय के गुजरला के बाद भी उनुके जमींदारी के मामला के देखरेख करत रहनीं. महेंद्र मिश्र के जीवन के एतना रंग बा कि रउआ जेतने देखेम ओतने लागी कि अलग-अलग  छवि निकल के सामने आ रहल बा जइसे कवनो फिलिम चलत हो. पहलवानी के कसल, लम्बा-चौड़ा बदन, चमकता माथा, देह पर सिल्क के  कुर्ता, गर्दन में सोना के चेन अउरी  मुँह में पान के गिलौरी.. अइसन आकर्षक रहल महेंद्र मिश्र के  व्यक्तित्व.

स्वतंत्रता संग्राम अउरी  महेंद्र मिश्र

महेंद्र मिश्र के समय गाँधी के उदय के समय ह. बिहार स्वतंत्रता सेनानी संघ के अध्यक्ष विश्वनाथ सिंह अउरी एह इलाके के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी श्री तापसी सिंह आपन लेख में दर्ज कइले बानीं कि महेंद्र मिश्र स्वतंत्रता सेनानी लोग के आर्थिक मदद करत रहनीं. एह सन्दर्भ में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के चौदहवा अधिवेशन, मुबारकपुर, सारण ‘इयाद के दरपन में’ देखल जा सकsता. सारण के इलाके के कई स्वतंत्रता सेनानी अउरी कालांतर में सांसद (बाबू रामशेखर सिंह और श्री दईब दयाल सिंह) भी ई बात कहले बानीं कि महेंद्र मिश्र के घर स्वंतंत्रता संग्राम के सिपाही लोग के गुप्त अड्डा रहल. उनुका घर के बैठक में संगीत अउरी गीत गवनई के अलावा राजनीतिक चर्चा भी खूब होखे. उनके गाँव के अनेक समकालीन बुजुर्ग लोग भी एह बात के पुष्टि कइले बा कि महेंद्र मिश्र स्वाधीनता आन्दोलन के क्रांतिकारी सब के खुला हाथ से सहायता करत रहनीं. आखिर उनुका हिस्सा भी त ऊ दर्द रहल कि:

हमरा नीको ना लागे राम गोरन के करनी

रुपया ले गईले,पईसा ले गईलें,ले सारा गिन्नी

ओकरा बदला में दे गईले ढल्ली के दुअन्नी

पूरबी सम्राट महेंद्र मिश्र के सब रचना अपार लोकप्रियता के सोपान तक पहुँचल. भोजपुरी अंचल टूट के उनके गीतन के अपना दिल में जगह देहल लेकिन साहित्य-इतिहासकारन के नजर में महेंद्र मिश्र अछूत ही बनल रहनीं. केहू उनपर ढंग से बात करे के कोशिश ना कइल. अलबता एकाध पैराग्राफ में निपटावे के  कुछ सूचनात्मक कोशिश जरुर भइल. रामनाथ पाण्डेय लिखित भोजपुरी उपन्यास ‘महेंदर मिसिर’ अउरी  पाण्डेय कपिल रचित उपन्यास ‘फूलसुंघी’, पंडित जगन्नाथ के ‘पूरबी पुरोधा’ अउरी जौहर सफियाबादी द्वारा लिखित ‘पूरबी के धाह’ लिखल गइल बा. प्रसिद्ध नाटककार रवीन्द्र भारती ‘कंपनी उस्ताद’ नाम से  नाटक लिखले बानी जेके वरिष्ठ रंगकर्मी संजय उपाध्याय खूब खेलले बानी.

 

 नकली नोट के छपाई के किस्सा अउरी गोपीचंद जासूस

महेंद्र मिश्र कलकत्ता खूब आईं-जाईं. तब कलकता न केवल बिहारी मजदूर के पलायन के सबसे बड़ा केंद्र बल्कि राजनीतिक गतिविधि के भी सबसे उर्वर जमीन रहे. कलकता में उनकर परिचय एगो अंग्रेज से भइल जे उनुकर गायकी के मुरीद रहे. ऊहे अँगरेज़ लन्दन लौटे के क्रम में नकली नोट छापे के मशीन महेंद्र मिश्र के देहल जेके लेके ऊ गाँव चली अइनी अउरी अपना भाई सब के साथे मिलके नकली नोट के  छपाई शुरू कर देहनी. सारण इलाके में आपन छापल नकली नोटन से महेंदर मिसिर अंग्रेजी सत्ता के अर्थव्यवस्था के रीढ़ तूरल शुरू कर देहनी.

 

महेंद्र मिश्र पर पहला उपन्यास लिखे वाला रामनाथ पाण्डेय अपना उपन्यास ‘महेंदर मिसिर’ में लिखले बानी कि ‘महेंद्र मिश्र अपना सुख-स्वार्थ खातिर ना बल्कि शोषक ब्रिटिश हुकूमत के अर्थव्यवस्था के धराशायी करे खातिर अउरी अंग्रेजी अर्थनीति के विरोध करे के उद्देश्य से नोट छापत रहनीं. एह बात के भनक लागते अंग्रेजी सरकार आपन सीआईडी जटाधारी प्रसाद अउरी सुरेन्द्र लाल घोष के नेतृत्व में अपना जासूसी तंत्र के सक्रिय कर देहलस अउरी आपन जासूस हर तरफ लगा देहलस. सुरेन्द्रलाल घोष तीन साल तक महेंद्र मिश्र के लगे गोपीचंद नामक नौकर बनकर रहलन अउरी उनके खिलाफ तमाम जानकारी इकट्ठा कइलन.

 

तीन साल बाद 16 अप्रैल 1924 के गोपीचंद के इशारा पर अंग्रेज सिपाही महेंद्र मिश्र के उनुका भाई लोग के साथे पकड़ लेहल. गोपीचंद के जासूसी अउरी गद्दारी खातिर महेंद्र मिश्र एगो गीत गोपीचंद के देखत गवनीं कि –

पाकल पाकल पानवा खिअवले गोपीचनवा पिरितिया लगा के ना,

हंसी हंसी पानवा खिअवले गोपीचानवा पिरितिया लगा के ना…

मोहे भेजले जेहलखानवा रे पिरितिया लगा के ना…

गोपीचंद जासूस जब ई सुनलन त उहो उदास हो गइलन. उहो मिश्र जी के प्रभाव में तुकबंदी सीख गईल रहलन एही से गाकर उत्तर देहलन कि  –

नोटवा जे छापि छपि गिनिया भजवलs ए महेन्दर मिसिर

ब्रिटिस के कईलs हलकान ए महेन्दर मिसिर

सगरे जहानवा मे कईले बाडs नाम ए महेन्दर मिसिर

पड़ल बा पुलिसिया से काम ए महेन्दर मिसिर

सुरेश मिश्र एह घटनाक्रम के बारे में लिखले बाडन कि – ‘एक दिन किसी अंग्रेज अफसर ने जो खूब भोजपुरी और बांग्ला भी समझता था,इनको ‘देशवाली’ समाज में गाते देखा. उसने इनको नृत्य-गीत के एक विशेष स्थान पर बुलवाया. ये गए. बातें हुईं.वह अँगरेज़ उनसे बहुत प्रभावित हुआ. इनके कवि की विवशता,हृदय का हाहाकार,ढेलाबाई के दुखमय जीवन की कथा,घर परिवार की खस्ताहाली तथा राष्ट्र के लिए कुछ करने की ईमानदार तड़प देखकर उसने इनसे कहा- तुम्हारे भीतर कुछ ईमानदार कोशिशें हैं. हम लन्दन जा रहे हैं. नोट छापने की यह मशीन लो और मुझसे दो-चार दिन काम सीख लो. यह सब घटनाएँ 1915-1920 के आस-पास की हैं.’

पटना उच्च न्यायालय में महेंद्र मिश्र के केस के पैरवी विप्लवी हेमचन्द्र मिश्र अउरी मशहूर स्वतंत्रता सेनानी चितरंजन दास कइनीं. महेंद्र मिश्र के लोकप्रियता के ई आलम रहे कि उनके गिरफ्तारी के खबर मिलते बनारस से कलकत्ता तक के तवायफ सब, विशेषकर ढेलाबाई, विद्याधरी बाई, केशरबाई आदि आपन-आपन गहना उतार के अधिकारी सब के देवल शुरू कर दिहल लोग कि गहना लेके  मिश्र जी के छोड़ देहल जाव. सुनवाई तीन महीना तक चलल. लागत रहे कि मिश्र जी छूट जाएम  लेकिन अइसन ना भईल अउरी मिश्र जी आपन अपराध कबूल कर लेह्नीं. महेंद्र मिश्र के दस वर्ष के सजा सुना के बक्सर जेल भेज देहल गइल. महेंद्र मिश्र के भीतर के कवि अउरी गायक जेल में जल्दी ही सबके आपन प्रशंसक बना लेहल. उनके संगीत अउरी कविताई पर मुग्ध होके तत्कालीन जेलर उनुके जेल से निकालके अपना घर पर रख लेह्लन. ऊहें महेंद्र मिश्र जेलर के बीवी बच्चनके भजन अउरी कविता सुनावे अउरी सत्संग करे लगनीं. ओही जगह पर महेंद्र मिश्र भोजपुरी के प्रथम महाकाव्य अउरी आपन काव्य के गौरव-ग्रन्थ “अपूर्व रामायण” रचनीं. मुख्य रूप से पूरबी खातिर  मशहूर महेंद्र मिश्र कई फुटकर रचना के अलावा महेन्द्र मंजरी, महेन्द्र बिनोद, महेन्द्र मयंक, भीष्म प्रतिज्ञा, कृष्ण गीतावली, महेन्द्र प्रभाकर, महेन्द्र रत्नावली , महेन्द्र चन्द्रिका, महेन्द्र कवितावली आदि कई रचना के सर्जना कइनीं.

 प्रेम के पीर अउरी प्रेम में मुक्ति के कविगायक

ई ज्ञात तथ्य बा कि कलकत्ता, बनारस, मुजफ्फरपुर आदि जगह के कई गो तवायफ महेंद्र मिश्र के आपन गुरु माने. इहाँ के लिखल कई गीतन के कोठा पर सजल महफ़िल में गावल जाए. पूरबी के प्रसिद्धि महेंद्र मिश्र से ही भइल चूँकि मिश्र जी एक तरफ त हारमोनियम, तबला, झाल, पखाउज, मृदंग, बांसुरी पर अद्भुत अधिकार राखत रहनीं त दोसरा तरफ ठुमरी टप्पा, गजल, कजरी, दादरा, खेमटा जइसन गायकी अउरी अन्य कई शास्त्रीय शैली पर भी जबरदस्त अधिकार रहे. एही कारण उनके हर रचना के सांगीतिक पक्ष एतना मजबूत रहे कि जुबान पर आसानी से चढ़ जाए अउरी तवायफ सब उनके गीतन के खूब गावे. उनके पूरबी गीतन में बियोग के साथ-साथ गहरा रूमानियत के अहसास भी दिखेला जे अन्य भोजपुरी कविता में कम पावल जाला .

अंगुरी मे डंसले बिआ नगिनिया, ए ननदी दिअवा जरा दे/ सासु मोरा मारे रामा बांस के छिउंकिया, सुसुकति पनिया के जाय, पानी भरे जात रहनी पकवा इनरवा, बनवारी हो लागी गईले ठग बटमार / आधि आधि रतिया के पिहके पपीहरा, बैरनिया भईली ना, मोरे अंखिया के निनिया बैरनिया भईली ना / पिया मोरे गईले सखी पुरबी बनिजिया, से दे के गईले ना, एगो सुनगा खेलवना से दे के गईले ना, जइसन असंख्य गीत में बसल विरह अउरी प्रेम के भाव पत्थर के भी पिघलावे के क्षमता राखेला.

कहल त ईहो जाला कि महेंद्र मिश्र के गीतन में जवन दर्द बा ऊ ढेलाबाई अउरी अन्य कईगो तवायफ लोगन के मजबूरी, दुख:दर्द के वजह से बा. ढेलाबाई से महेंद्र मिश्र के मित्रता के कई पाठ लोक प्रचलन में बा लेकिन एक स्तर पर ई घनानंद के प्रेम के पीर जइसन बा. एही से महेंद्र मिश्र के लगे प्रेम में विरह के वेदना के तीव्रता एतना ज्यादा बा कि दगादार से यारी निभावे के हद तक चल जाला. ढेलाबाई अउरी महेंद्र मिश्र के बीच के नेह-बंध के एह तरे समझल जा सकेला. प्रेम में मुक्ति के जवन स्वर महेंद्र के बा, ऊ लोकसाहित्य में विरले बा. कहल जाला कि उनके गायकी से पत्थर पिघल जात रहे, सारण से गुजरे वाली गंगा अउरी नारायणी के धार मंद पड़ जाए. अइसन  गायकी रहे महेंद्र मिश्र के, लेकिन अफ़सोस भोजपुरी के ई नायब हीरा अपना जाए के सात दशक में किंवदंती अउरी मिथक सरीखा बना देहल गइलन. हमनीं के अपना लोक के इतिहास संरक्षित करे में हमेशा उपेक्षा के भाव रखेनी जां. हमनीं लगे राजा अउरी शासक लोग के इतिहास त बा लेकिन लोक ह्रदय-सम्राट के ना. महेंद्र मिश्र अइसनके उपेक्षा के मारल कलाकार हई. 16 मार्च 1886 से शुरू भईल ई यात्रा 26 अक्टुबर 1946 के ढेलाबाई के कोठा के पास बनल शिवमंदिर में समाप्त हो गइल अउरी पूरबी के सम्राट दुनिया के अलविदा कह देह्नीं. महेन्द्र मिश्र के दिल त बहुत बड़का रहल लेकिन उनुका खातिर दुनिया छोट पड गइल. उहाँ के अपना प्रेम गीत में दगादार से यारी अउरी प्रेम में स्वतंत्रता के भाव विशेषकर स्त्री के पक्ष में पैदा कईनीं. भोजपुरी के लगभग सभी गायक-गायिका लोग महेंद्र मिश्र के गीतन के आपन आवाज़ देले बा. कहल जाला कि होत होई लोग कईगो कवि-गायक बाकिर महेंद्र मिश्र जइसन केहू दूजा न, भईल न होई.

आज ओही महेंद्र मिश्र के जन्मदिन ह.

 

 

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