भोजपुरी में भी एगो तुलसीदास बाड़न, आपन भाषा में धर्म के बारे में लिखेलन

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कहल जाला कि मनुष्य जवन काम करे के ठान लेला.. त फिर ओकरा आगे हर मुश्किल आसान हो जाला। बड़ से बड़ काम भी इंसान चुटकी बजा के क सकेला। बस ओकर दिल में उ काम करे के ललक होखे के चाहिं। जइसे गोस्वामी तुलसीदास.. आपन एही ललक के चलते… प्रभु प्रेरणा से.. संस्कृत रामायण के अवधी भाषा में रामचरितमानस के रुप में लिख के… जन-जन खातीर सुलभ बना दिहले रहन।

आज ओसहीं एगो उदाहरण वाल्मीकि नगर में देखे के मिल रहल बा। वाल्मीकि नगर के तपोभूमि में आज एगो अइसने तुलसीदास आपन ललक से अवधी रामचरितमानस के भोजपुरी भाषा में अनुवाद क लेले बाड़न। अउर एही से आचार्य व्रतराज द्विवेदी के भोजपुरी के तुलसीदास कहल जा रहल बा।

आचार्य व्रतराज के अनुसार 1983 में गीता जयंती के अवसर प उनका इ प्रेरणा मिलल रहे कि गीता जइसन कठिन धर्मग्रंथ के भोजपुरी में अनुवाद कइला से एकरा जन-जन ले पहुंचावल जा सकेला।

tulsidasगीता के भोजपुरी अनुवाद कइला के बाद भोजपुरी लेखन में आचार्य व्रतराज के रुचि जाग गइल। जेकरा चलते उ कैकेयी माई, उर्मिला,  बहरियावल बहु, वैदेही विवाह समेत दर्जनों खंडकाव्य लिख डललन। 2014 में सिरीमद करुणाकर रामायण नाम से भोजपुरी रामायण सबके सामने छपके आइल। एही बीच अन्य ग्रंथ जइसे दुर्गा सप्तशती, भागवत, सत्यनारायण व्रत कथा के भी भोजपुरी में अनुवाद कइलन।

जहवां आज 60 वर्ष के बाद सेवानिवृत हो के लोग घर प बइठ जालें ओहिजे 77 वर्ष के अवस्था पार कर चुकलन आचार्य व्रतराज द्विवेदी विकल शिक्षक पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात अउर अधिक सक्रिय हो गइल बाड़न अउर उनकर सक्रियता के अंदाज एही से लगावल जा सकेला कि उ अब ले 50 ग्रंथों के रचना कर चुकल बाड़न। जवना में से 25 पुस्तक छप चुकल बा। कुल मिलाके स्नातक में काव्य लेखन के जवन सफर शुरू भइल रहे उ अब ले निर्बाध गति से जारी बा। लिहाजा इ उम्र में भी भोजपुरी भाषा के विकास खातीर  आचार्य व्रतराज के पहल सबके खातीर  अनुकरणीय बा।

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