ऋतुराज वसंत का आगमन… बनन में, बागन में, बगरयो बसंत है

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ऋतुराज वसंत का आगमन हो गया है। आसमान बिलकुल नीला साफ हो गया है। खेतों में खिले सरसों के चटख पीले फूल और उनकी खुशबू ने एकदम बिंदास अंदाज में ऋतुराज बसंत के आगमन का संदेश दे दिया है।

सभी स्कूलों में मां सरस्वती की पूजा होगी। बंगाल और बिहार के जो स्कूल हैं, आज बच्चे स्कूलों में पूरे भक्ति भाव से सरस्वती पूजा धूम धाम से मनाते हैं। जो बच्चे अभी मां की गोदी से दूर नहीं जाते हैं, खेलते कूदते हैं, उन नए बच्चों की शिक्षा की शुरुआत भी की जाती है। वसंत पंचमी को एक प्रकार से माता सरस्वती का संगीतमय अभिवादन निरूपित किया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। धर्मग्रंथों में बसंत पंचमी (BasantPanchami) को श्री पंचमी, सरस्वती पंचमी, ऋषि पंचमी सहित कई नामों से जाना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि इसी दिन विद्या की देवी मां सरस्वती का जन्म हुआ था। ऋग्वेद में ऐसा वर्णन मिलता है कि ब्रह्मा जी अपनी सृष्टि के सृजन से संतुष्ट नहीं थे। तब उन्होंने अपने कमण्डल से जल का छिड़काव किया, जिससे हाथ में वीणा लिए एक चतुर्भुजी स्त्री प्रकट हुईं। ब्रह्माजी के आदेश पर जैसे ही देवी ने वीणा पर मधुर सुर छेड़ा, संसार को ध्वनि मिली, वाणी मिली, ब्रह्मा जी ने देवी का नाम सरस्वती रखा, जिन्हें हम शारदा, वीणावादनी के नाम से भी जानते हैं। भारत में मां शारदा की पूजा के लिए कई स्थान बेहद ही प्रसिद्ध हैं। मां शारदा के कई प्राचीन मंदिर अभी भी देश में मौजूद हैं।

देखिए, देवी सरस्वती के कुछ रहस्यमय मंदिरों को…

साहित्य के जो साधक लोग हैं उनके लिए तो वसंत पंचमी का दिन एक बड़े उत्सव के समान है। हर साहित्य साधक अपनी रचना का प्रारंभ करने से पूर्व मां सरस्वती को याद करता है। इतना ही नहीं किसी भी साहित्यिक आयोजन का प्रारंभ भी माता सरस्वती की आराधना से ही होता है। जिस व्यक्ति पर माता सरस्वती की कृपा होती है, उसका साहित्यिक पक्ष उतना ही श्रेष्ठ होता है। हम जानते हैं कि इसी दिवस पर माँ वीणा वादिनी के वरद पुत्र महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का भी जन्म दिन है। निराला जी के साहित्य में हमें वह सब पढ़ने को मिल जाता है, जो एक सरस्वती पुत्र के साहित्य में होनी चाहिए।

कवि पद्माकर को तो बसंत का कवि ही कहा जाता है । बसंत ऋतु की चर्चा हो और कवि पद्माकर की चर्चा ना हो यह संभव नहीं। रीति काल के कवियों में इन्हें श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। जिस प्रकार ये अपनी परंपरा के परमोत्कृष्ट कवि हैं उसी प्रकार प्रसिद्धि में अंतिम भी। देश में जितना इनका नाम प्रसिद्ध हुआ वैसा फिर आगे चलकर किसी और कवि का नहीं हुआ। बसंत के बारे में कवि पद्माकर ने चुनिंदा शब्दों में जो लिख दिया वो  अद्भुत है

कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में
क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है।
कहे पद्माकर परागन में पौनहू में
पानन में पीक में पलासन पगंत है
द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में
देखौ दीप-दीपन में दीपत दिगंत है
बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में
बनन में बागन में बगरयो बसंत है

भारत की छः ऋतुओं में वसंत ऋतु विशेष है।  भारत का वसंत कुछ विशेष है। भारत में वसंत केवल “फागुन”में आता है और फागुन केवल भारत में ही आता है। गोकुल और बरसाने में फागुन का फाग, अयोध्या में गुलाल और अबीर के उमड़ते बादल, खेतों में दूर-दूर तक लहलहाते सरसों के पीले-पीले फूल, केसरिया पुष्पों से लदे टेसू की झाड़ियां, होली की उमंग भरी मस्ती, जवां दिलों को होले-होले गुदगुदाती फागुन की मस्त बयार, भारत और केवल भारत में ही बहती है।“

वसंत ऋतु में श्रृंगार रस की प्रधानता है और रति इसका स्थायी भाव है, इसीलिए वसंत के गीतों में छलकती है मादकता, यौवन की मस्ती और प्रेम का माधुर्य। वसंत पंचमी को एक प्रकार से माता सरस्वती का संगीतमय अभिवादन निरूपित किया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संगीत के अहम छह रागों में राग वसंत सबसे खास है। जैसा कि नाम से ही पता चल जाता है, यह वसंत ऋतु से जुड़ा है। यह राग अमूमन  वसंत के त्यौहारों के समय गाया जाता था। होली वसंत ऋतु का प्रमुख त्यौहार होने के कारण स्वाभाविक रूप से होली का त्यौहार भी राग वसंत से एक गहरा जोड़ रखता है।

देखिए राग वसंत के सुरों की बानगी…

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