मर्णिकर्णिका घाट पर शिव आजहुं ढ़ढ़त बाड़न कान के कुंडल

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हिन्दू मान्यता के अनुसार मोक्ष प्राप्ति खातिर सबसे बड़ा तीर्थ स्थान बनारस के कहल जाला । एहिजा  दूर-दूर  से लोग मोक्ष प्राप्ति खातिर आवेलन । एहि से काशी शहर के चर्चा दूर-दूर तक गूंजेला । लेकिन आज हम रउआ लोग के वाराणसी के घाट मर्णिकर्णिका घाट के बारे में बताइब अउर इ भी बताइब की काशी  के मर्णिकर्णिका  घाट पे ही काहे मोक्ष के प्राप्ति होला।

imagesइ कहानी दु तरह के घटनाओं से जुड़ल बा, एक  त भगवान विष्णु और दूसर शिव और पार्वती से। कहल जाला की भगवान विष्णु शिव के तपस्या करत समय आपन सुदर्शन चक्र से एक कुंड खोदले रहलन। तपस्या करत समय ओही कुंड में भगवान विष्णु के पसीना भर गइल रहे। जब भगवान शिव विष्णु के तपस्या से  खुश होके अइनी त ओही समय भगवान विष्णु के कान के कुंडल ओह कुंड मे गिर गइल रहे।

दुसर कहानी के अनुसार कहल जाला कि भगवान शिव आपन सखा के साथे ज्यादा समय इहवा ही बितावत रहलन। माता पार्वती ए से काफी दुखी रहली। सोचली हमार पति हमरा साथे समय ना  बिता पावेलन।  तब माता पार्वती एक दिन परेशान हो के, भगवान शिव के अपना साथे रोके खातिर, आपन कान के कुंडल ओहे घाट पर छुपा देली और भगवान शिव के  ढूढ़े खातिर कहनी।

आज इ मान्यता बन गइल बा की जेकर भी शव मर्णिकर्णिका घाट पर आवेला भगवान शिव ओ से पूछेले कि का तू माता पार्वती के कान के कुण्डल देखले बाड़ा।

एतना ही ना इ घाट के सबसे बड़ विषेशता इ ह की इ घाट के चिता के अग्नि लगातार जलते रहेला, कबो बुझेला ना ।

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