काहे लौट रहल बा बिदेसिया

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लोग के जत्था के जत्था दिल्ली से पूर्वांचल लौट रहल बा। कारण ऊहे कोरोना! एह विषय पर गहना टीम से लेखक अउरी कवि रामजी तिवारी से बातचीत के कुछ अंश-
दिल्ली से पलायन के जवन दृश्य आ रहल बा, ऊ भयावह बा। कहाँ त सरकार लॉकडाउन ई सोच के कईल कि लोगबाग अपना घर में रही । एक दूसरा के बीच शारीरिक दूरी बरती । अइसन कर के हमनी के देश सामुदायिक स्तर के फैलाव के रोक पाईत। जनता लॉकडाउन के लगभग स्वीकार भी कईल । तमाम परेशानी के बीच लोग ई मानल कि कोरोना से बचे के ईहे उपाय बा कि घर में बइठल जाय। एकर फैलाव के कड़ी के तूरल जाय ।

लेकिन दू दिन पहिले दिल्ली से ई खबर आईल कि लोगबाग सैकड़न के संख्या में पैदले आपन-आपन गांव खातिर निकल रहल बा। एमे से केहू के 100 किमी पैदल चले के बा त केहू के 1000 किलोमीटर तक भी । पहिले त लागल कि ई एक तरीका के दुस्साहस ह जे कुछ लीग ही कइले बा लेकिन दिन बीतत-बीतत ई साफ हो गईल कि ई कुछ लोग के दुस्साहस ना, बल्कि हजारन- लाखन मजदूर के मन मे उपजल भाव ह कि हमरा अपना घरे लौटे के बा भले एकरा खातिर पैदले ही काहे ना चले के पड़े ,चाहें केतनो परेशानी काहे ना सहे के पड़े ।

एह बात के कल्पना ना त सरकार कइले रहे ना ही समाज के बड़ हिस्सा । लेकिन आज के तस्वीर बता रहल बा कि लोग के हजारो-हजार किलोमीटर के यात्रा कईल गंवारा बा, लोग तमाम कष्ट सहे खातिर तैयार बा, लेकिन एह महानगर में रहे के तैयार नईखे । अब ई सब लोग कवनो कीमत पर शहर छोड़ के जाए के चाहsता ।

त सवाल ई उठsता कि आखिर अइसन काहे भईल ?

पहिलका बात त ई कहल जाता कि चूंकि लोग के काम-धाम बंद हो गईल बा, उनुके नियमित आमदनी समाप्त हो गईल बा, त ऊ लोग घर लौटल मुनासिब समझल।

दूसर ई कि एह सब लोग के लगे रहे के कवनो पर्याप्त व्यवस्था पहिलेही से ना रहल, एह हालात में जब आमदनी भी ना रही त फेरु ईहां रहे के का फायदा ?

तीसर बात ई कि बिना आमदनी के ई लोग एक तरह से भिखारी जइसन महसूस करे लागेला। कमाई कवनों बा ना, अउरी पेट के भोजन चहबे करी । एह हालत में भोजन खातिर दूसरा पर निर्भर रहल ई लोग के गंवारा नईखे।

चौथा ई कि लोग के शायद समझ मे आ रहल बा कि ई समस्या लंबा चल सकsता, अइसन हालत में दोसरा के टुकड़ा पर केतना दिन तक जिंदा रहल जा सकsता।

पांचवा ई कि घर के लेके भी इनके मन मे चिंता बा कि अइसन विपरीत परिस्थिति में ऊ लोग का जाने कईसे रहत होई। त बेहतर बा कि साथे ई विपदा के झेलल जाय ।

अउरी फेरु बाद में उड़े वाला कुछ अफवाह कि सरकार जाए खातिर कवनो न कवनो व्यवस्था करिये दी । एही से बेहतर बा कि घर खातिर निकल लेहल जाव ।

संभव बा कि उनके मन मे कुछु अउरी बात चल रहल हो जे हम अभी समझ नईखी पावत बाकी कुल मिलाके उनुके भीतर ई बात त जरूर बईठ गईल बा कि दिल्ली में दूसर के दया पर जीये के अपेक्षा बेहतर ई बा कि दु-चार-दस दिन के परेशानी झेलके अपना गांव-कस्बा लौट जाईल जाय ।

अब ईहां दूसर सवाल उठsता कि जवन बात एतना बड़ आबादी के मन मे उठत रहल ह, ओके हमनी के सरकार चाहे समाज काहे ना समझ पावल?

पूर्वांचल अउरी बिहार के रहे वाला लोग जान रहल बा कि उहाँ से शहर के तरफ केतना भारी पलायन भईल बा ।अउरी ईहो कि एमे से बहुसंख्यक आबादी उहां जाके भी कवनों अच्छा जीवन नइखे व्यतीत करत । बस होता ई कि ऊ लोग के आपन अउरी अपना परिवार के सांस चलावे लायक जीवन मिल जाता। ऊ केवल जीवन होला …कवनो गरिमापूर्ण जीवन ना ।

जे भी पूर्वांचल अउरी बिहार से दिल्ली बम्बई जाए वाला ट्रेन के देखले बा, ऊ जानsता कि टॉयलेट अउरी पायदान पर खड़ा होके चाहे बईठ के भी हजारो लोग रोजदिन ई महानगरन में पहुंचेला। दिन में काम करेला अउरी शाम के कवनो दरबा चाहे फुटपाथ पर सुत जाला। ऊ लोग के लगे एह शहर में रहे के एकमात्र कारण बा- इहाँ काम के मिलल । एतना काम कि उनुके परिवार के सांस चल सको ।

ध्यान रहे कि एह पलायन में अभी ऊ लाखो लोग के आबादी शामिल नइखे जे पूर्वांचल चाहे बिहार चाहे झारखंड से एह महानगरन में पहुंचल बा । काहे कि ऊ लोग के लगे रहे के जगह बा, नियमित काम बा। ऊ लोग के जीवन मध्ववर्गीय जीवन के आसपास बा। बेशक कि एह त्रासदी में ऊ आबादी भी परेशान बा, लेकिन एतना ना कि गांव या घर लौटे के बारे में सोचे । काहे कि ओकरा हिसाब में महानगर के जीवन गांव चाहे कस्बा के मुकाबले हर तरह से बीस बईठेला।

जबकि पलायन कर रहल आबादी एह मौका पर कवनो हिसाब लगावे त ओकर पलड़ा पलायन के पक्ष में झुकेला।

दरअसल ई हमनी के कमी ह कि हम एह जनता से कट गईल बानी जा। हमनी के जानते नईखी कि हजारो-लाखो लोग एह देश में अइसन भी बा जेकरा जीवन मे सांस त चल रहल बा लेकिन जीवन के कवनो गरिमा नइखे बचल। हमनी के एह जनता से डिस्कनेक्ट हो गईल बानी जा, एही से हमनी के ई आश्चर्यजनक लागता। हमनी के यानि समाज भी अउरी सरकार भी ।

ई त्रासदी हमनी के देश अउरी समाज खातिर एगो सबक बा कि हम अपना ओह जनता के बारे में भी सोचीं जेसे हम काम त लेनी लेकिन जेकरा के हम अपना साथ नईखी गिनत।

ई तस्वीरें इंडिया अउरी भारत के बीच के अंतर के भी दर्शा रहल बा, जेके बीच के खाई दिनोदिन चौड़ा होत ईहां तक पहुंच गईल बा।

बिदेसिया आज अपने ही देस से परदेसी हो के लौट रहल बा!

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