महेंदर बाबा के भक्तिगीत

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आज पुरबी के जनक महेंदर मिसिर के जन्मदिवस ह. महेंदर बाबा त हर राग अउरी मिजाज के गीत लिखले गवले बानीं. इहाँ के लिखल अनेक भक्ति गीत बा जे आजो गावल-गुनल जाला. प्रस्तुत बा ओही भक्तिगीतन से कुछ गीत.

 

पढ़े छवो शास्त्र ओ अठारहो पुरान देखे

वेदों को भी आदि से अंत तक छाना है।

तीर्थव्रत तप दान योग ध्यान ग्यान अस्नान

संध्या बंदन तर्पन का भाव सब जान है।

पढ़े शिल्प विद्या अवर ज्योतिष को भली भांति

रमल का भेद विधि पूर्वक पहिचाना है।

बैद्यक के न्यारे-न्यारे जाने हर एक अंग

नाड़ी पहचाना और नस्तर का लगाना है।

जानी है वणिज अवर व्यवहारन की रीत सभ

खोटे वअर खड़े का ग्यार उर आना है।

चाकरी के जेते सब जाने है दाँव-घात

जाना है खेत फुलवारी का जमाना है।

जाना है ढोलक मृदंग झांझ सारंगी

सहनाई सितार अ़वर तमूरे का बजाना है।

जाना है धु्रपद मल्हार देस कालिंगरा

काफी बिहाग राग सोरठ का गाना है।

जाना है बनाना रूपए अवर असरफी का

जाना है अनेक भांति कलों का घुमाना है।

इतना जिन जाना तिन खाक भी ना जाना

वो वही एक जाना जिन राम नाम जाना है

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खेलइत रहलीं हम सुपुली मउनियाँ

ए ननदिया मोरी है, आई गइलें डोलिया कहाँर।

बाबा मोरा रहितें रामा, भइया मोरा रहितें

ए ननदिया मोरी हे, फेरि दीहतें डोलिया कहाँर।

काँच-काँच बाँसवा के डोलिया बनवलें,

ए नदिया मोरी है लागी गइलें चारि गो कहाँर।

नाहीं मोरा लूर ढंग एको न रहनवाँ

न ननदिया मोरी लेई के चलेलें ससुरार।

कहत महेन्दर मोरा लागे नाही मनवाँ

ए ननदिया मोरी हे छूटि गइलें बाबा के दुआर।

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जा मुख राम नाम न आवे।

भूले हूँ जे राम जपे ना सर्प विलासत जावें।

नर कूकर सूकर सम डोलत-घर-घर पोंछ हिलावे/जामुख

धरम सनातन छोड़छाड़ के औरवें धरम सिखावे।

परहित बात करत ना कबहूँ निज स्वारथ देखलावे/जामुख

द्विज महेन्द्र विनवों का भाई विरथा जनम गँवावे।

जा मुख राम ना आवे।

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गोकुला नगरिया में बाजेला बधइया हाय रे सँवरियों लाल।
जनमे लें नंद के कुमार हाय रे सँवरिया लाल।
जसोदा लुटावे राम अनधन सोनवाँ हाय रे साँवरियो लाल।
नंद जी लुटावे धेनु गाय हाय रे सँवरियो लल।
बंसहा चढ़ल आवे भोला अड़भंगी हाय रे सँवरियो लाल।
ब्रह्मा जी सुनावे वेद चार हाय रे हाय रे सँवरियो लाल।
कोठा चढ़ि सुरूज झाँके अँगना में चंदा हाय रे सँवरियो लाल।
निरखे महेन्द्र इहो नंद के ललनवाँ हाय रे सँवरियो लाल।
भरि गइलें राजा के दुआर हाय रे सँवरियो लाल।

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कुछो दिन नइहरा में खेलहूँ ना पवनी बारा जोरी से।

संइयाँ मांगेला गवनवाँ हो राम बाराजोरी से।

बभना निगोरा मोहे बड़ा दुख देला बराजोरी से।

उहे रे धरेला सगुनवाँ हो राम बाराजोरी से।

लाली-लाली डोलिया के सबुजी ओहरिया बाराजोरी से।

सइयाँ ले अइलें अँगनवाँ हो बाराजोरी से।

नाहीं मोरा लूर ढंग नाहीं बा गहनवाँ हो बाराजोरी से।

सइयाँ देखिहें मोर जोबनवाँ हो बाराजोरी से।

मिलि लेहु जुली लेहु संग के सहेलिया हो बाराजोरी से।

फेरू नाहीं होइहें मिलनवाँ हो बारा जोरी से।

कहत महेन्द्र कोई माने न कहनवाँ हो बाराजोरी से।

सइयाँ लेके चलले गवनवाँ हो बाराजोरी से।

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आहो गदाधारी नजरिया तनी फेरी,

भगत सब करेलें पुकार कर जोरी।।

लागल बाटे आस दरसन होई कब तोरी,

नजरिया तनी फेरी।।

बल के निधान हई विद्या के आगर,

हमरा के बनाई नाथ पऊआँ के चाकर,

आठो सिद्ध नवो निधि के हईं दाता,

रउए हईं माता-पिता रउए जनम दाता,

नजरिया तनी फेरी।।

सुनीले की ढेर रउरा पतितन के तारी,

हमनीं के बेरी काहे कइले बानी देरी,

द्विज महेन्द्र कहे नाथ बाटे मति थोरी,

दरसन दे दीहीं तनी कहीं कर जोरी।

नजरिया तनी फेंरी।। आहो गदाधारी।

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बँसहा चढ़ल अइले शिव मतवालवा हे,
कइसे में परिछब भोला बउराहवा हे।।
अंग में विभूति डिम-डिम डमरू बजावे हे,
टक-टक ताके मोरा गौरी निहारे हे।।
कइसन बेढंगा बरवा दुअरा पर ठाढे़ हे,
दुलहा के देखि मोरा जियरा डेराला हे।।
भूत-बैताल संगे सँपवा चबाबे हे।।
अइसन बउराह बर के गउरा न देहब हे,
बलु गउरा रहिहें मोरा बारी कुँआरी हे।।
नारद के हम का ले बिगरनी हे,
समुझि-समुझि शिव हँसले अँगनव हे,
निरखे ‘महेन्द्र’ रूप कइसन बनवलें हे।।

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गउरा ऐतन तपवा कइलू तू बउरहवे लागी ना।
बउरहवे लागी ना हो बउरहवे लागी ना।।
इनका दुअरवा गउरा सूपवो ना दउरा,
हो बउरवे लागी ना।।
घर ना दुअरवा गउरा भीखे के ठेकाना,
हो अलखिए लागी ना।।
कहत महेन्द्र भोला अवढर दानी हउअन,
हो त्रिभुवन के स्वामी ना।
गउरा एतना तपवा कइलू।

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हर हर कर नत तरत तरन तर।

कस न दीन पर द्रवउ उमावर।

बिसम गरल धर पियत जहर कर,

चढ़त बयल पर कर डमरू धर।

अवढर ढरन सरन प्रतिपालन,

दुष्ट दलन दारून दुख हर-हर।

मुंडमालधर ब्याल गाल पर

ब्याघ्र छाल पर असन धतुरकर।

द्विज महेन्द्र पूजत हर-हर कर

बम-बम-बम शिव मम आरत हर।

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सभी दिन होत न एक समान।

एक दिन राम लखन दूल्हा बने जानत सकल जहान।

एक दिन बन-बन फिरत भिखारी जागत होत बिहान।

एक दिन रावण बादशाह था चढ़ाता पुष्प विमान।

एक दिन खेपड़ी ताल बजावे लास पड़ी मैदान।

एक दिन राजा हरिश्चन्द्र को धन था मेरू समान।

एक दिन जा के बिके डोम घर पहरा देत मसान।

द्विज महेन्द्र अब चेत सबेरा क्या सोवत मैदान।

चिड़िया चूँग रही तेरी खेती फिर ना होत बिहान।

अइसन- अइसन कई गो गीतन के मोती से महेंदर बाबा के भक्ति गीत के माला सजल बा.

 

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